दिव्य कुम्भ, भव्य कुम्भ, चलो कुम्भ, लेकिन क्यों चलें कुम्भ ?

दिव्य कुम्भ, भव्य कुम्भ, चलो कुम्भ,
लेकिन क्यों चलें कुम्भ ?


ब्यूरो संवाद

प्रयागराज। विवेक श्रीवास्तव (विक्कू) पिछले करीब एक साल से कुम्भ मेले का प्रचार प्रसार देख रहे हैं। उन्होंने हमसे साझा किए हैं अपने अनुभव, आइए जानते हैं उन्हीं के शब्दों में उन्हीं की जुबानी क्या है महाकुंभ?

महा कुम्भ इलाहाबाद , जो अब महा कुम्भ प्रयागराज हो गया है, प्राचीनतम धर्म सनातन धर्म के अनुसार भारत मे मनाया जाने वाला विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला और मेरे अनुसार सिर्फ  धार्मिक मेला नहीं विश्व का सबसे बड़ा इवेंट , इवेंट मैनेजर के लिए सीखने और देखने के लिए, इवेंट कंपनियां तो बहुत होंगी लेकिन "लल्लू टेंट /लल्लू जी एंड सन्स" के बिना कोई कुम्भ पूरा हो ही नहीं सकता , जी हां आँखों देखी बता रहा हूँ 2010 के हरिद्वार कुम्भ में आफिशयल 1 महीने की ड्यूटी पर तैनात कर दिया गया , कैलाश अस्पताल की तरफ से,
जाने से पहले बहुत असमंजस में था कैसे क्या करूँगा 1 महीने बाबाओं के बीच , खैर हिम्मत करके गया, क्योंकि नौकरी जो करनी ही थी, रुड़की आश्रम के "महा मंडलेश्वर श्री यतींद्रनाथ गिरी जी" के डेरे पर पहुँच गए, भव्य स्वागत हुआ, फिर एक टेंट की तरफ भेज दिया गया, बताया गया यही रहने का स्थान है, टेंट के अंदर पहुंचने पर नज़ारा ही कुछ और था , 5 स्टार न सही 3 स्टार व्यवस्था अंदर ही थी, अब दिल थोड़ा प्रसन्न हुआ।

गुरु जी से मुलाकात हुई, साथ ही उनके बहुत सारे बाबा , व् अन्य साधू संतो से भेंट हुई, अब समय मिलते ही मैं बाबा लोगो से जानने की कोसिस कर रहा था ये इतना बड़ा मेला लगता क्यों हैं इतने लोग यहाँ आते क्यों है, एक तरफ तो जवाब था आस्था का सबसे बड़ा मेला है, समुद्र मंथन के समय से होता आ रहा है, और भी बहुत सी पौराणिक बातें, लेकिन मेरे को अभी तक संतुष्ट जवाब नहीं मिल पा रहा था,
बाबा लोगो के पास लाल बत्ती, 4-6 गनर के साथ शैडो , और दिन भर इधर से उधर घूमती रहती थी, जिनके यहाँ मैं ठहरा था वो गुरु जी भी आते जाते थे, एक दिन मैंने भी साथ चलने की इक्षा जताई और हा तब तक यानी 3-4 दिनों में मैंने भी भगवा धोती धारण कर ली थी।



मेरे साथ चलने की इक्षा को सहर्ष स्वीकार कर लिया गया, और साथ में भी जूना अखाड़ा के एक अन्य महामंडलेश्वर जी के डेरे पर पहुंच गया, वहाँ हुई करीब 1 घंटा चर्चा हुई, अपने धर्म पर, संस्कृति पर, देश पर , अखण्ड भारत पर और बहुत सी बातें जो मैं जानना चाहता था वो अब जान रहा था, अब मैं रोज गुरु जी के साथ धोती बाँध के साथ चल देता था, सभी जगह भव्य सादर सत्कार , अल्पहार के साथ दक्षिणा भी मिलती थी, कुम्भ का असली महत्व मैं अब समझ चुका था, अपनी धर्म संस्कर्ति , अखाड़े के बारे में भी जानकारी मिली, पायलट बाबा जैसे गुरुओं से भी भेंट हुई जिन्होंने लाखों विदेशियों को अपना शिष्य बना रखा है,
इसी स्थान पर जहाँ से एक तरफ चंडी देवी और मंशा देवी के दर्शन हवन कुंड के पास से हुए वही पहली बार नवरात्रों के सारे व्रत मैं रहा,
तो यदि आप कुम्भ जा रहे है तो सिर्फ डुबकी लगाने न जाए ,
"अपने आप को खोजने जाए" अपने आप को अपनी संस्कृति को जानने जाए , कुछ दिन रुक कर लोगों से मिल कर आये,
चलो कुम्भ,
भव्य कुम्भ दिव्य कुम्भ

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